इस सत्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि ‘समाज में बाजार के वर्चस्व’ को लेकर हाहाकारी मुद्रा अपनाने वाले हमारे साहित्य में भी अब बाकायदे बाजार का वर्चस्व स्थापित हो चुका है। प्रचार, प्रसार और चर्चा परिचर्चा की बदहवासी तथा सोशल मीडिया से मिली बेशुमार सहूलियतों के साथ आज का लेखक, एक तरफ इस दौड़ में शामिल है तो दूसरी तरफ भटकन का शिकार भी। यह न अस्वाभाविक है, न ज्यादा गलत ही…क्योंकि लेखक भी आकाश से उतरा कोई देवतुल्य या एलियन नहीं हुआ करता। कमजोरियां और हताशाएं उसमें भी व्यापती ही हैं बल्कि अतिसंवेदनशील होने के नाते सामान्य प्राणियों से ज्यादा ही। ऐसे में आज के लेखक में यह आशंका उपजनी स्वाभाविक है कि लगातार तेज रफ्तार होते जा रहे इस समय में आज का अधैर्यवान पाठक और आलोचक भी उसकी वृहताकार कृति को आद्योपांत पढ़ने का सब्र और समय निकाल पायेगा क्या?
जिस तरह हमारी पौराणिक कहानियों में जब भी किसी भक्त में लोभी, मोही किस्म की शकाएं और भ्रम उपजे हैं, तो भगवान तुरत फुरत किसी न किसी अवतारी रूप में उसके समाधान के लिए कोई न कोई उपाय, लीला रचते हैं, ठीक उसी तरह अधियायी सदी से लिखती आ रही बाजार की मांगों, विमर्शी उठापटकों और आंदोलनों से निर्लिप्त, ‘स्वान्तः सुखाय’ तथा सिर्फ ‘पाठक’ को ही अपना इष्ट मान कर लिखती चली आ रही, इस उम्रदराज लेखिका ने भी अनायास अपने आपको इन्हीं शंकाओं बनाम दुश्चिंताओं से घिरा पाया था। सबसे पहले तो चतुर्दिक आज के पाठक के समयाभाव और अधैर्यवान होने के चरचे। भगवानदास मोरवाल संकेत करते हैं ‘अतिव्यस्त’ आलोचकों द्वारा उपन्यास के ‘वृहताआकार’ को देखते ही कतरा कर निकल जाने वाले रवैये का अंदेशा… और सबसे बढ़कर ज्यादा पृष्ठों की वजह से काफी बढ़ी कीमत की संभावना। कीमत वाली आशंका पर एक युवा पाठिका की कही अबोध सी बात भी कभी भूल नहीं सकी कि- ‘आप तो पाठकों की लेखिका है मैडम, इतने वर्षों से पाठकों ने ही आपको सर आंखों पर रखा है। कीमत ज्यादा होगी तो आपके पाठक कैसे पढ़ पायेंगे!
आंशिक रूप से ही सही, मेरा विचलित होना स्वाभाविक था। यह जानते हुए भी कि यह उपन्यास मेरी दस वर्षों की अथक तपस्या का प्रतिफल है और इसके एक-एक शब्द मेरी कलम से ज्यादा मेरी दुःखती रगों के गवाह हैं… डेढ दो दशकों के मेरे अमेरिकी प्रवास के दौरान, वहां महसूस की विस्थापन की अव्यक्त पीड़ाएं, रीतते जुड़ाव, विश्वव्यापी मंदी की मार झेलते भारतीय युवाओं की हताशा और उफ न करने की शर्तों पर अपने जीवन मूल्यों की पिटारी सहेजते, ‘सरवाइवल’ की राहें तलाशते प्रवासी भारतीय। इस सारे कुछ का गवाह हुआ यह उपन्यास, अब मेरे सामने एक बड़े प्रश्नवाचक चिन्ह की तरह खड़ा था।
अब तक, मेरे पहले उपन्यास ‘मेरे संधिपत्र’ से लेकर ‘यामिनी-कथा’ तक, पांचों में से कोई भी सवा डेढ़ सौ की पृष्ठ संख्या पार नहीं कर पाया था। स्त्री-विमर्श तथा दलित विमर्श की सारी संभावनाओं के बावजूद मैं उनसे कतराती अपने प्रतिपाद्य विषय पर मन मुताबिक ही लिखती चली गई थी। यूं भी, मेरे सारे स्त्री, पुरूष, चरित्र हमेशा अपने बूते ही अपना जीवन जीते आये हैं मेरी कृतियों में….
लेकिन अब, इतने वर्षों के अंतराल पर आयी, इस औपन्यासिक कृति को लेकर मैं भयंकर ऊहापोह से गुजर रही थी। केंद्र में वे ही दो शब्द- आज का पाठक और वृहताकार उपन्यास की ज्यादा कीमत…. अपनी कलम पर अटूट विश्वास रखने वाला अस्थिर मन यहां तक सोचने लग गया कि- यह भी तो हो सकता है कि इतने वर्षों तक लिखते, छूटते तारतम्यों के बीच बहुत कुछ ऐसा लिखा गया हो जिसे ‘एडिट’ किया जा सके… (पाठक, मूल्य दोनों का समाधान) लेकिन कौन करेगा एडिट? किसके पास होगा इतना (फालतू) समय, गहरी समझ और दृष्टि? अर्थात अव्यक्त आशंकाओं के बीच एक रचनाकार का डिगता आत्मविश्वास, बेचैन अंतर्द्वंद्व…. मेरी कलम जिसने कभी कोई शर्त नहीं मानी थी, स्वयं बिन ब्याही लड़की की तरह स्वेच्छा से ‘एडिटिंग’ की संभावनाओं पर सोचने लगी थी।
यूं मन को आश्वस्त करने के उदाहरण भी कम नहीं थे। पिछले वर्ष ही प्रसिद्धि और लोकप्रियता का अर्धशतक पूरा करने वाले श्रीलाल शुक्ल के कालजयी उपन्यास ‘रागदरबारी’ (जिसे हर पीढ़ी के पाठकों की स्वीकृति और स्नेह मिला) को छोड़ भी दिया जाए तो ढाई दशक पहले के, ‘पहला गिरमिटिया’ ‘मुझे चांद चाहिए’, ‘इदन्नमम्’, ‘आवां’, ‘कथा सतीसर’, ‘कुइयांजान’, ‘सुक्खम् दुक्खम् और इधर के वर्षों में आये उषा किरन खान का ‘अगन हिंडोला’ तो मेरे सामने था ही, एक के बाद एक दबीज उपन्यासों की लोकप्रियता का कीर्तिमान स्थापित करने वाले ज्ञान चतुर्वेदी का ‘हम न करब’ और ‘पागलखाना…’ जैसी आश्वस्तियां सामने थीं… लेकिन मेरे मन की द्विधा अपनी जगह… कि न तो मैं इन लेखकों की तरह ‘शिखर सिद्ध’ और पर्याप्त चर्चित हूं, न ही मालती जोशी की तरह लोकप्रिय और ‘क्राउड-पुलर’ ही। कुल मिलाकर हमेशा की तरह अपने विपक्ष में खड़ी थी मैं।
यद्यपि अपने उपन्यास के चार-पांच ड्राफ्ट देखने और एक-एक पंक्ति से आश्वस्त होने के बाद ही मैंने अंतिम ड्राफ्ट फाइनल किया था…. लेकिन अब अपनी कलम के प्रति मेरा विश्वास कमजोर पड़ता जा रहा था। ‘बाजार’ की शक्तियां मुझे सहमा रही थीं।… (अब सोचती हूं, क्या सभी लेखकों का कभी न कभी ‘इस तरह अपनी कलम में विश्वास डिगा होगा! इस तरह की आशंकाएं व्यापी होंगी!)
लगभग उन्हीं दिनों अकस्मात् ही यह संयोग घटा था। वरिष्ठ समीक्षक और कवयित्री डॉ. चंद्रकला त्रिपाठी से बात हो रही थी। संभवतः उन्होनें बातों के बीच मेरा असमंजस भांपा। स्वयं ही उपन्यास की सॉफ्ट कॉपी भिजवाने का अनुरोध किया। लगभग दो सप्ताह बाद, पूरे मनोयोग से उपन्यास पढ़ने के बाद उन्होने फोन पर अपना दो – टूक और निश्चयात्मक निर्णय दिया- ‘एक भी पृष्ठ या वाक्य काटने, हटाने की जरूरत नहीं है दीदी- ऐसा का ऐसा जाने दीजिए (प्रकाशन के लिए) …. अपने पाठक को कम करके न आंकिए….
बहुत बड़ा संबल पकड़ाया था, उस एक वाक्य ने मुझे जबकि स्वयं मेरे अंदर की आवाज भी मुझे लगातार यही समझाने की कोशिश कर रही थी कि पूरे पांच कम पचास वर्षों से जो पाठक तुम्हारी कलम का पाथेय बने रहे हैं, उन पर अविश्वास मत करो। बाजार और पाठक को लेकर उपजे सारे भ्रमों को नकारता, बगैर किसी अतिरिक्त चर्चा परिचर्चा के यह उपन्यास आज पाठकों के बीच है जिनमें साहित्य ममर्ज्ञ पाठकों से लेकर छोटे बड़े शहरों के वरिष्ठ रचनाकार तक शामिल है। सुदूर दक्षिण के तमिलनाडु की ‘पारणा’ हैं तो गोवा की चंद्रलेखा भी। लखनऊ के एक पाठक ने उपन्यास का एक गहरा अंश, एक सम्मानित पत्र के कालम में साझा किया तो पंजाब के एक पाठक की इस बात से मन भींग गया कि यह उपन्यास तो मैं दूनी कीमत देकर भी मैं खरीदता मैडम।
सिर्फ मेरे और उक्त पाठक के लिए नहीं, समूचे लेखक वर्ग के लिए यह एक रोमांचक अहसास है कि जेनुइन पाठक गुम नहीं हुआ है, बाजार के शोर शराबे में। वह आज भी शायद उस लेखन को ढूंढ रहा है जो सिर्फ उसी के लिए डूब कर लिखा जा रहा हो। अर्थात लेखक वही लिखे जो उसे लिखना है, न कम न ज्यादा। उसका लिखा देर सबेर पाठक तक पहुंचेगा ही।…. लेकिन हां, ‘धैर्य’ लेखक में भी चाहिए…., यह समझ भी कि जल्दबाजी, शॉर्टकट और उत्तरआधुनिक फार्मूले कुछ दिनों की उछाल, चर्चा और पुरस्कार, सम्मानों की युति भले जुटा दें उसकी कृति को बहुत दूर तक नहीं ले जा पाएंगे। मैंने कभी विनोद में कहा था कि समीक्षकों को तो बहलाया फुसलाया जा भी सकता है (मित्रभावी रिश्तों का वास्ता देकर) किंतु पाठकों को नहीं। पाठक तो खरा ही बोलेगा। चर्चाओं के बहकावे में आकर वह पुस्तक खरीद भले लें लेकिन उस पर अपनी स्वीकृति की मुहर नहीं लगायेगा… और विश्वास कीजिए, लाखों लाख के पुरस्कार प्राप्त करने के बाद भी अगर लेखक के पास पाठक नहीं हैं तो वह लेखक बहुत अकेला, उदास और हताश महसूस करेगा।
तो बाजार का दबाव बेशक है। जो लोग पाठकीय रूचि में बदलाव का वास्ता देते हैं वे भी ज्यादा गलत नहीं कहते। आज का नया पाठक संवेदना नहीं, सनसनी चाहता है। वह फास्ट फूड की तरह चटपटा, पास टाइम लेखन ढूंढता है लेकिन अपना बहुवर्गी, बहुवर्णी पाठक अभी भी… ‘दिल ढूंढता है फिर वही फुर्सत के रात दिन…’ की तरह, कृति में सबसे पहले गहगही संवेदना और मर्म की तलाश करता ही नजर आता है।…..
– सूर्यबाला
