जयपुर: राजस्थान प्रगतिशील लेखक संघ द्वारा आयोजित समानांतर साहित्य महोत्सव के तीसरे दिन नागार्जुन मंच पर कई विमर्श आयोजित किये गए। एक दिलचस्प सत्र नीदरलैंड में रहने वाले राजमोहन का था। अपने एकल प्रदर्शन में उन्होंने हिंदी क्षेत्र के भोजपुरी, मैथिली, मगही, अवधी आदि भाषाओं के गीत गाकर सुनाए। बिहार के गिरमिटिया मज़दूरों की व्यथा भी सुनाई। स्टेज पर मात्र एक गिटार और बिना किसी अन्य साजो सामान के राजमोहन ने अकेले गाया। एक गीत के बोल थे " सात समंदर पार कराई के, दु तीन महीना जहाज पर , रिश्ता- नाता छूट जाए। पांच ब्रिज कमाई जे, घर लौटब जमाई के। " बीच बीच में वे दर्शकों से बातचीत करते जाते थे।
अधिकांश गीत प्रवासी मज़दूरों पर केंद्रित था। उन्होंने कहा भी " गिरमिटिया हमारे समय का मेटाफर बन गया है। साथ में यह भी कहा " भोजपुरी के नाम पर अश्लील व फूहड़ गीत हमारी संस्कृति का हिस्सा नहीं है।" राजमोहन के अन्य गीत में था " रोज -रोज खोजील, कमरा में जाके, उल्टा -सीधा करके ज़िंदगी हमार तू कहाँ गइले"
एक समकालीन पॉप गीत सुनाया " हम ना मांगी ला जल्दी-जल्दी, जिये जिनगी, देह में लगी ला हरदी, जेबी में हाथ डालके, मौज के उधार के, हैम बैठ ला सपना के द्वार पर, बरखा के मद्धिम बौछार से, ताल से सुर से दूर, झूलेंगे गीत के धार पर तोरे खातिर।"
रोज हम तोके लोरी सुनावे, तू बादर में ईगो सितारा बांटे, कैसे बोली तू रह जा, कैसे बोली तू ना जा, मांगीला हम ईगो जवाब हम होस हेराके , जिंदिगी के गइले से तो मन से तू हेरायजा, ई दुनो आंख के बेटे चमकत हीरा।"
बुढापा पर आधारित एक नज़्म दर्शकों द्वारा काफी पसन्द किया गया "आये गए फिनो लौट के फिर उ जगहा से, जहां से मन के दुइ तीन इच्छा गुमेज के बीगल ईगो गोना में, खोजे है बुढापा जवानी के मुहर, सोना के पानी में" । राजमोहन खुद को ग़ज़ल सम्राट जगजीत सिंह का गुरु ब भाई बताते हैं क्योंकि दोनों कलावंत घराने से आते हैं। उन्होंने कुछ गज़लें भी सुनाई। जैसे " बात निकलेगी को तो दूर तलक जाएगी, लोग बेवजह उदासी जा सबब पूछेंगे, एक नज़र देखेंगे गुज़रे ह्यूए सालों की तरह, चूड़ियों पर भी कई तंज किये जायेंगे, कांपते हाथों पर भे फिकरे कसे जाएंगे "
