नई दिल्लीः यह छायावाद का शताब्दी वर्ष है. छायावाद, यानी हिंदी साहित्य का वह काल जिसका उत्थान 1918 से 1936 तक, भले ही कम समय के लिए रहा, पर जिसने हमें जयशंकर प्रसाद, सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला', सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा जैसी अप्रतिम मेधा से भरे रचनाकार दिए. पर जयशंंकर प्रसाद की 'कामायनी' इस दौर की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कृतियों का शीर्ष कहें, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी. जयशंकर प्रसाद रचित 'कामायनी' 'आधुनिक छायावादी युग का सर्वोत्तम और प्रतिनिधि हिंदी महाकाव्य है।. यह जयशंकर प्रसाद अंतिम काव्य रचना है, जो प्रकाशित तो 1936 में हुई, परंतु इसके लेखन, संकलन, प्रणयन में 7-8 साल का समय लगा था. 'चिंता' से प्रारंभ कर 'आनंद' तक 15 सर्गों के इस महाकाव्य में मानव मन की विविध अंतर्वृत्तियों का क्रमिक उन्मीलन इस कौशल से किया गया है कि मानव सृष्टि के आदि से अब तक के जीवन के मनोवैज्ञानिक और सांस्कृतिक विकास का इतिहास भी स्पष्ट हो जाता है. इस लिहाज से कामायनी आज के समाज और जीवन में व्याप्त तुमुल कोलाहल को पहले से ही वर्णित कर चुकी है. यह जयशंकर प्रसाद के आध्यात्मिकता और दर्शन से भरे रचनाकर्म की विशेषता ही है कि 'कामायनी' के सर्ग सुंदर गीतों के माध्यम से मानव हृदय की उथल-पुथल और भावनाओं के संवेग को जीवंत कर देते हैं.
मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी ने महाकवि जयशंकर प्रसाद के महाकाव्य 'कामायनी' की मूल पांडुलिपि का पुनः प्रकाशन किया है. यह अकादमी की ओर से प्रसाद की स्मृति को जीवंत रखने के साथ ही छायावाद के एक शतक होने पर हिंदी जगत को उसकी अनूठी सौगात है. अकादमी के निदेशक डॉ उमेश कुमार सिंह ने प्रो. आनंद कुमार सिंह के माध्यम से, जिनके पास महाकाव्य 'कामायनी' की पांडुलिपि की प्रतिकृति साल 1983-84 से ही थी, को मंगाकर इसे संरक्षित कर आम पाठकों को उपलब्ध कराने का प्रयास किया है.  प्रो आनंद कुमार सिंह के पास संरक्षित प्रति जर्जर हो चुकी थी. अब मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी ने 155 पन्नों की यह पांडुलिपि साफ सुथरे ढंग से प्रकाशित की है तथा अंत में प्रसाद के निवास, प्रेमचंद के साथ उनके चित्र, पंडित नेहरू के काशी आगमन पर रत्नाकर रसिक मंडल द्वारा आयोजित अभिनंदन समारोह, सुरती बनाने की ढेकी एवं प्रसाद द्वारा व्यवहृत मुदगर आदि के चित्र सहित सुघनी साहु की पूरी वंशावली जयशंकर प्रसाद के प्रपौत्र से प्राप्त कर प्रकाशित की है. अकादमी के इस कदम की सर्वत्र तारीफ हो रही है. साहित्यकार ओम निश्चल ने अपने फेसबुक पेज पर लिखा है कि छायावाद के शताब्दी वर्ष में साहित्य अकादेमी मध्यप्रदेश की यह बेहतरीन पेशकश का स्वागत किया जाना चाहिए. इसका मूल्य केवल 125 रुपये है. यदि इसे किसी निजी प्रकाशक ने छापा होता तो इसका मूल्य 500 रुपये से कम न होता. अकादेमी को साधुवाद!