पटना: साहित्यिक संस्था ' दूसरा शनिवार ' के आयोजन में इस बार चयन किया गया था युवा कवि श्रीधर करुणानिधि का। उन्होंने इस आयोजन में खोना, मंझधार, अपने-अपने हिंडोले में, चांद से रिश्ता, डर, चांद चिड़िया और भूख, तेरे हिस्से का पहाड़ अब उनका, थोड़ा और अंधेरा दे दो, देवताओं की उम्र नहीं पूछी गई, वसंत के पार, हंसोड़ आदमी की आदत, शोर उस शहर, हमारे हिस्से में, उनका पानी, 30 जनवरी, कभी की बारिश, नादानी, फेंकना, पहरा देने की जिद एवं आराम करने की जगह अच्छी है शीर्षक की कविताएं सुनाई। पढ़ी गयी कविताओं पर चर्चा की शुरुआत करते हुए विद्या भूषण ने कहा कि "उनकी भाषा ताजगी लिए हुए है। कविताएँ बिंब गढ़ने वाली हैं तथा व्यंग्य के माध्यम से जटिल यथार्थ को अभिव्यक्त करती हैं।" मुकेश प्रत्यूष ने चर्चा को आगे बढ़ाते हुए कहा कि ‘थोड़ा और अंधेरा दे दो’ में अंधेरे के अलग-अलग शेड्स हैं। " राकेश शर्मा बोले कि " कवि की कविताओं के मूल में प्रेम है। प्रेम को विचार से और विचार को प्रेम से नहीं काटते हैं।" अरविन्द पासवान के अनुसार " समकालीन कविताओं को सुनते हुए लगा कि कविताएं नई एवं ताजा नहीं है… पहले भी कहा गया है, पर कहने का ढंग प्रमुख है।" अरुण नारायण ने कहा कि श्रीधर करुणानिधि की कविताएँ सुनते हुए सुखद आश्वस्ति होती है।" कौशलेंद्र कुमार कहते हैं कि कविताओं में चांद भी लगातार बढ़ रहा है… खूबसूरती है, उम्मीदें हैं।
आलोचक आशीष मिश्रा ने कहा कि " ‘30 जनवरी’ कविता जब दादी की कोमल याद से जुड़ जाती है तो महत्वपूर्ण हो जाती है। यह मनुष्य केन्द्रीयता ही अच्छी कविता की पहचान है। मनुष्य को उसके दुख-दर्द, शोषण, संघर्ष से अलग कर नहीं देख सकते।" चन्दन सिंह ने कहा " श्रीधर करुणानिधि की कविताएँ वायवीय नहीं हैं, वे मिट्टी से जुड़ी हुई हैं। आखिरी कविता ‘30 जनवरी’ उन्हें अच्छी लगी।"
नरेन्द्र कुमार के मुताबिक "कवि अपनी कविता ‘खोना’ में भूख के साथ हंसी की बात करते हैं। उभरती शक्तियां ‘हंसी’ तो ले जाती हैं, पर ‘भूख’ को छोड़ देती है, इसे अभिव्यक्त करना कवि की प्राथमिकता में है। दूसरी कविता ‘मंझधार’ में वे शहर और गांव की चर्चा करते हुए उन्हें मिलाने वाले पुल की बात करते हैं जहां दोनों जगहों के लोग अपना दुख-दर्द कहते हैं।"डॉ बी एन विश्वकर्मा ने कहा कि ‘थोड़ा और अँधेरा दे दो’ कविता उन्हें अच्छी लगी। सभी कविताएँ संवेदनापूर्ण लगीं। कवि समस्याओं से जुड़ते हैं। प्रत्यूष चंद्र मिश्रा ने अपनी बात रखते हुए कहा " कवि वैचारिक कविता को रचते हुए जमीन पकड़े रहते हैं। पूर्णिया एवं पटना की स्थानिकता उनकी कविताओं में आयी हैं तथा वे परिवेश को बहुत ही खूबसूरती से रचते हैं। "
इस मौके पर डॉ. बी. एन. विश्वकर्मा, कौशलेंद्र कुमार, राकेश शर्मा, विद्या भूषण, ओसामा खान आदि मौजूद थे। अंत में नरेन्द्र कुमार द्वारा धन्यवाद-ज्ञापन किया गया।
